तारिनी

आज सोचा कुछ लिखती हूँ ,
जो सुन ना पाई तो खुद को पढ़ती हूँ ,
कशती पर हूँ सवार, पहूँचना है उस पार।

पर डरती हूँ ,
अकेली हूँ, फिर भी लहरों से लड़ती हूँ।

जानती हूँ नहीं है आसान , दूर है साहिल और बढ़ता ये तुफान ,
गिरती हूँ, संभलती हूँ, घबराती हूँ, पर बढ़ती जाती हूँ,
तो क्या हुआ जो डगमगा गयी , कुछ पल के लिए हार गयी ,
गिर कर उठूँ, उठ कर गिरूँ।

तारिनी हूँ मैं, यूँ ही नहीं सागर में उतर जाती हूँ ।

About the author

Shivani Sharma

Student by profession and learner by obsession. I admire writings just like an orchestra craves for its symphony. I believe what can't be said should better be penned down.

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