इंसानियत

इंसानियत इंसानों पे ना जाने कितने शेर लिखे जाते हैं,

इंसानों की इंसानियत हमें ना इसमें बतलाते हैं ,

इंसान अगर बचे हैं तो इंसानियत क्यों मर जाती है,

फिर बेटी की आबरू क्यु भरे बाजार लूटी जाती है।

 

क्यों हम चुप रह जाते हैं ऐसी कठोर है हैवानी पे,

शायद सच तो यह है कि सच को हम झूठलाते हैं,

अभी सजग ना हुए तो आग बढ़ती ही जाएगी,

आने वाली पीढ़ी भी हमें ही दोषी ठहराएगी।

 

गीता के बताए राहों पर हमें चलना ही होगा,

जहरीले नागों का फन कुचलना ही होगा।

 

बिकाश

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Vikash

मैं अपने संस्कृति को दुनिया तक पहुंचने के लिए कविता को एक जरिया बना रहा हु जिससे दुनिया के लोग हिंदुस्तान के संस्कृति को अच्छे से समझ सके।

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