farmer

किसान

जिस धरती को उसने
अपने खून से सींचा
उस धरती मां के बेटे को
कलम मेरी नमन करती है

दिन-रात ये कामे करता
फिर क्यू आहे भरता
कड़ाके की धूप हो
या बरसात की रात

फिर भी कमी रह जाती है
बच्चों को कहां पढ़ाता
आमदनी का स्रोत जो है
दाम उसका गिर जाता

घर का खर्च चलाने में ही
सोच सोच घबराता
साहूकारों से कर्ज जो लिया
ना फसल बेच चुका पाता

शुद्ध ब्याज के चक्कर में
जब खेत उसका बिक जाता
बिन पानी मछली जैसी
मौत को गले लगाता ।

विकाश

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Vikash

मैं अपने संस्कृति को दुनिया तक पहुंचने के लिए कविता को एक जरिया बना रहा हु जिससे दुनिया के लोग हिंदुस्तान के संस्कृति को अच्छे से समझ सके।

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