छोटे नहीं हो तुम

 

अगर तुम्हारी आँखों में है बादल,
और तुम्हारे शरीर मे रेत है,
यकीन मानो छोटे नही हो तुम/

अगर विसरती है तुम्हारे शरीर से
मेहनत के पसीने की बदबू,
अगर फैक्ट्री के धुएं से पड़ गया
है तुम्हारा चेहरा काला,
हाथो की नसें अगर मोटी हो उभर
आयी है पेड़ की जड़ो के मानिंद,
तुम्हारे चेहरे पर अब तक है,
चेचक के दाग
यकीन मानो, छोटे नहीं हो तुम/

अगर जाते हो तुम रेल के टॉयलेट
में ठूंस ठूंस कर,
अगर तुम भी बिछा कर सो जाते हो अपना गमछा,
अगर अब भी है तुम्हारी आंखों
में मुठ्ठी भर आसमान,
अगर अब तक नही गला
तुम्हारे हौसले का बर्फ,
अगर अब भी अपनी दिहाड़ी
से देखते हो अपने बच्चों को
‘कलेक्टर साब’ बनाने का सपना,
अगर अब भी तुम बनाते हो पंजाब में सेठो की कोठियां,
अगर अब भी चू रही है तुम्हारी
मड़ई की छान,
यकीन मानो छोटे नही हो तुम।

अगर तुम्हें पता है,
सपने जीये जाते है,
राते काटी जाती है,
दिन गुजर जाता है,
बारिश बेमौसम भी आती है,
बाढ़ के बाद फिर से गांव बसते है,
रेत से जाँबाज़ पैदा होते है,
पेड़ किसी की राह तकते सूख जाते है,
माँ अपने हिस्से की मिठाई बच्चों के लिए बचा देती है,
उनींदी आँखे आधी ही खुलती है,
पूरे सपने लिए,
तो यकीन मानो कोई तुम्हे छोटा नही कर सकता।

हिमांशु राज
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय

About the author

Himanshu Raj

हर शै की अपनी उम्र है,
जौन , दाग़, दुष्यंत की रौ में भटकता एक गजलगो,
कुछ नज्मों का मालिक,
कुछ कविताओं का पहरेदार।

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