कुछ न कह पाई…

वो अक्सर कहता था थाम लो मुझे,
टूटा हूँ मैं समेट लो मुझे,
वो अक्सर कहता था आंखें भरी हैं मेरी,
अपनी आंखों में थोड़ी सी पनाह दो मुझे।

थामा, समेटा, संभाला और पनाह भी दी,
पर मालूम न था…

बिखरी तो मैं थी, टूटी तो मैं थी,
आंखें नम मेरी भी थी,
न उसने गौर किया, न मैंने बताया,
न उसने समझा और न ही कभी मैं समझा पाई।

वो अक्सर कहता रहा और मैं अब तक,
कुछ न कह पाई,
कुछ न कह पाई…

 

रेणुका

About the author

Renuka Katoch

Hi, I'm Renuka. Aspiring doctor but find peace in these writings. I struggle with endless conversations and deep thoughts inside my head. Can't survive without my family. Love cooking, eating and sleeping. Want to see the world in search of my own story. Read my poems and find me in them.

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